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क्या उत्तर प्रदेश चुनाव में काशी- मथुरा बन सकेंगे चुनावी मुद्दा ! तो मुसलमानों का वोट किसको ?

"अयोध्या हुई हमारी ,  अब काशी-मथुरा की बारी" जैसे कई अलग- अलग  नारों से इस बार उत्तर प्रदेश चुनाव को एक नया रंग दिया जा रहा है, कभी कब्रिस्तान, कभी श्मशान, तो किसी के राम, तो किसी के परशुराम, उनकी जाति वाले के वहां छापेमारी, पंडित जी की यादव से यारी, ठाकुर सत्ताधारी, दलित चुनाव के समय चढ़ने वाली खुमारी, पिछड़ी ना चाह कर भी याद आ जाने वाली.... और  ना जाने कौन-कौन से समीकरणों से उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ा जा रहा है. लेकिन हम यहाँ कुछ समीकरणों की बात करते हैं, जो पिछले चुनाव से मेल भी खाते हैं फिर भी कारगर नहीं दिख रहे है. यूपी इलेक्शन में इस बार धर्म को एक अलग पहचान मिली है, सभी राजनीतिक पार्टियाँ जाति के समीकरण के साथ ही साथ एक ख़ास धर्म के एंगल से चुनाव को जीतने में जुटी है. इसकी  अनेकों वजहें है लेकिन उत्तर प्रदेश में एक मुद्दे को सबसे बड़ा बनाने की कोशिश चल रही है, वो ये है कि अयोध्या के बाद मथुरा में मंदिर निर्माण कराने का वादा करना और इसके नाम पर वोट बटोरना, लेकिन इस बार परिस्थिति बदली हुई नज़र आ रही है. हालांकि यह एजेंडा भारतीय जनता पार्टी के तरफ से...

कौन है बिहार को 'शराबी' बनाने के ज़िम्मेदार'! क्या है शराबबंदी कानून की ज़मीनी हकीकत?

बिहार में शराब या शराब में बिहार एक ऐसी लाइन है, जो हर किसी के लिए समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, ठीक उस तरह ही जैसे बिहार पुलिस का शराब पीने वाले को पकड़ना, बजाए उनके जो शराब बेच रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से बिहार में शराब का सेवन करने वालों की धरपकड़ शुरू हुई है और इसके लिए सरकारी ड्रामा भी हुआ यानी प्रतिज्ञा भी ली गई, हालांकि इसके बाद ही शराब नहीं पीने की कसम खाने वाले वर्दीधारी भी खुद को रोक नहीं सकें और उस गले को शराब से तर करने में जुट गए, जिस से प्रतिज्ञा के बोल निकलें थे.  सवाल से बचते मुख्यमंत्री खैर हम भी कहाँ पीने वालों पर सवाल करने में जुट गए, उनको भला कौन रोक सकता है! लेकिन अब सवाल ये उठता है कि दिन के उजालों से लेकर रात के अंधेरों में मधुशाला का जाम छलकाने वाले महा-मनुष्यों को ऐसा महा-रस किस महारथी के महारत से मुहैया होता है या यूँ कह लें कि किस 'माननीय' के मान में इसको मान्यता मिल रही है?  वैसे तो इसका जवाब देने में प्रदेश के मुखिया नीतीश कुमार भी बगल झाँकने लगते हैं और फिर वही पुरानी घिसी हुई लाइन दोहराते हुए अधिकारीयों पर इलज़ाम लगा कर बच निकलते हैं. लेकिन असल माय...

देश का भविष्य सड़को पर

बचपन इंसानी ज़िन्दगी का सबसे हसीन पल होता है चंचलता ललकता जिज्ञासुकता और शिक्षा हर एक बच्चे का मौलिक अधिकार लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो ये ज़रूरी नही क्योंकि हाल की स्थिति और आंकड़े इसी ओर इशारा कर रहे हैं. बच्चे, जो देश का भविष्य कहे जाते है वो आज सड़क पर भीख मांगते  नज़र आ रहे हैं, ये परिस्थिति कहीं और की नहीं राजधानी दिल्ली की है. आंकड़े बताते है दिल्ली में 30000 (The National's Data)  बच्चे सड़को पर भीख मांगते है और पूरे  भारत में इनकी संख्या 400000 के करीब है। ये आंकड़े बढ़ते जा रहे है इन बच्चों से बात करने पर  पता चलता है की इन में से कुछ बच्चों  को  दूसरे शहरों से लाया जाता है और भीख मांगने पर  मजबूर किया जाता है और कुछ इसलिए मांगने को मजबूर है की उनकी माली हालत बहुत कमज़ोर है. देश भर में हर दिन  मे बच्चे की गायब होने की रिपोर्ट की जाती है जिसमे 50 फीसदी की रिपोर्ट ही राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्योरो (NCRB) को दी जाती है ,राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल  40000 बच्चों का अपहरण हो...